5 राज्यों में कांग्रेस का उभार, बनी सबसे बड़ी सियासी ताकत
नई दिल्ली: देश के पांच राज्यों के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प विरोधाभास पेश किया है। जहाँ भाजपा ने बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर अपनी सांगठनिक शक्ति का लोहा मनवाया, वहीं कांग्रेस पार्टी के लिए ये नतीजे 'रणनीतिक पुनरुद्धार' की नई कहानी कह रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता के मानचित्र से परे, कांग्रेस ने कई राज्यों में अपनी खोई हुई सियासी जमीन को वापस पाकर खुद को 2029 के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प के रूप में स्थापित कर लिया है।
दक्षिण भारत में कांग्रेस का दबदबा: केरल में 'संजीवनी'
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि केरल से आई है, जहाँ पार्टी ने 10 साल का वनवास खत्म करते हुए शानदार वापसी की है। यूडीएफ (UDF) की इस जीत ने कर्नाटक और तेलंगाना के बाद अब केरल को भी कांग्रेस के पाले में ला दिया है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के आक्रामक प्रचार और वायनाड के प्रभाव ने न केवल लेफ्ट (LDF) के किले को ढहाया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि दक्षिण भारत वर्तमान में कांग्रेस की राजनीति का सबसे मजबूत स्तंभ है। यह जीत पार्टी के राष्ट्रीय मनोबल के लिए एक महत्वपूर्ण 'बूस्टर डोज' साबित हुई है।
क्षेत्रीय शून्यता को भरती कांग्रेस: बंगाल और तमिलनाडु का परिदृश्य
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भले ही सत्ता की चाबी कांग्रेस के हाथ न आई हो, लेकिन पार्टी ने अपनी मौजूदगी का अहसास मजबूती से कराया है।
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पश्चिम बंगाल: 2021 के 'शून्य' से उबरकर इस बार सीटों और वोट शेयर में हुई वृद्धि कांग्रेस के लिए भविष्य की नई उम्मीद है। टीएमसी के कमजोर होने के बाद राज्य में पैदा हुए राजनीतिक वैक्यूम को भरने के लिए कांग्रेस अब एक स्वाभाविक विकल्प के रूप में उभर रही है।
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तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति के पारंपरिक समीकरणों के बीच अभिनेता विजय (टीवीके) के उदय ने राज्य की सियासत को त्रिकोणीय बना दिया है। ऐसे में कांग्रेस, जो दशकों से जूनियर पार्टनर की भूमिका में थी, अब एक 'निर्णायक शक्ति' (Kingmaker) के रूप में अपनी भूमिका तलाश रही है।
असम में द्विध्रुवीय राजनीति और 2029 की बिसात
असम में भाजपा की हैट्रिक के बावजूद कांग्रेस ने एक बड़ी रणनीतिक सफलता हासिल की है। बदरुद्दीन अजमल की पार्टी (AIUDF) के कमजोर होने और अल्पसंख्यक मतों का पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण होने से राज्य की राजनीति अब सीधे तौर पर भाजपा बनाम कांग्रेस के बीच सिमट गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 'वोट कटवा' राजनीति का अंत कांग्रेस के लिए लंबी अवधि में फायदेमंद होगा।
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