आदिवासी मजदूरों के अधिकारों को लेकर सोरेन का बड़ा बयान
झारखंड। के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी, विधायक कल्पना सोरेन, ने हाल ही में असम चुनाव से पहले राज्य के महत्वपूर्ण चाय बागान क्षेत्रों का दौरा किया। इस दौरान, उन्होंने सीधे चाय बागानों में काम करने वाले आदिवासी मजदूरों से मुलाकात की, उनकी समस्याओं को गहराई से समझा और उनसे सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने अपने राज्य झारखंड में चल रही विभिन्न लोक कल्याणकारी योजनाओं का जिक्र करते हुए असम में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार की नीतियों पर तीखा निशाना साधा।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने आधिकारिक एक्स (पहले ट्विटर) हैंडल पर एक भावुक पोस्ट लिखकर चाय बागानों में रहने वाले आदिवासी समाज की दशकों पुरानी दुर्दशा पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने अपने पोस्ट में इस समाज के योगदान और वर्तमान स्थिति के बीच के विरोधाभास को स्पष्ट किया। सोरेन ने लिखा, यह सिर्फ एक ट्वीट नहीं, बल्कि एक ऐसे समुदाय की आवाज़ थी जिसे लंबे समय से अनदेखा किया गया है।
सोरेन ने अपनी बातचीत और सोशल मीडिया पोस्ट में इस बात पर ज़ोर दिया कि आदिवासी समाज को आज भी उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया है। उन्होंने बताया कि उन्हें न तो अपनी ज़मीन पर मालिकाना हक़ मिलता है, न शिक्षा के क्षेत्र में बराबरी का अवसर दिया जाता है, और न ही उन्हें समाज में उचित सम्मान प्राप्त है। इससे भी अधिक अपमानजनक बात यह है कि उन्हें ‘टी ट्राइब’ कहकर एक सीमित पहचान में बांध दिया गया है, उनके अधिकारों को नकारा जाता है और आज भी उन्हें ‘कुली’ जैसे शब्दों से संबोधित कर नीचा दिखाया जाता है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि ये शब्द केवल उपाधियाँ नहीं हैं, बल्कि ये सदियों के शोषण, उपेक्षा और गहरी जड़ें जमा चुकी भेदभावपूर्ण मानसिकता का प्रतीक हैं।
अंग्रेजी राज से आजादी के बाद तक, शोषण की कहानी
सोरेन ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि अंग्रेज़ों के औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान, भारत के विभिन्न हिस्सों से आदिवासी समाज के लोगों को उनके मूल घरों और जीवनशैली से दूर कर असम के इन चाय बागानों में काम करने के लिए जबरन लाया गया था। उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में काम करने और जीने को मजबूर किया गया, जहाँ उनकी पीढ़ियों ने अपनी पूरी ज़िंदगी खपा दी। यह अत्यंत दुखद है कि देश को स्वतंत्रता मिलने के इतने दशकों बाद भी, इन मेहनतकश समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में कोई मूलभूत या सार्थक बदलाव नहीं आया है। उनकी मूलभूत आवश्यकताएं आज भी पूरी नहीं हो पाती हैं। यह स्थिति हमारे लोकतंत्र और न्याय प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि क्या यह स्वीकार्य है कि जिन लोगों ने अपने श्रम और समर्पण से इस धरती की अर्थव्यवस्था को खड़ा किया, उन्हें आज भी अपने अस्तित्व, अपनी पहचान और बुनियादी मानवीय अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़े? यह दर्शाता है कि एक बड़े वर्ग को अभी भी सामाजिक और आर्थिक न्याय से वंचित रखा गया है, जबकि वे देश के विकास में महत्वपूर्ण भागीदार रहे हैं।
आदिवासी पहचान और अधिकारों की बहाली पर जोर
हेमंत सोरेन ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं है। यह उससे कहीं बढ़कर, आदिवासी समाज के सम्मान की लड़ाई है, उनकी खोई हुई पहचान को वापस दिलाने की लड़ाई है, और उन्हें ऐतिहासिक न्याय दिलाने का संघर्ष है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह समय आ गया है जब आदिवासी समाज को उनके पूरे अधिकार मिलें। इसमें उनकी सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा, सामाजिक सम्मान की बहाली और भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सभी संवैधानिक हक़ों की सुनिश्चितता शामिल है। सोरेन ने अपनी बात समाप्त करते हुए एक सशक्त संदेश दिया, ‘अब चुप्पी नहीं चलेगी। इतिहास के इस अन्याय को हम सबको मिलकर ठीक करना होगा।’ उनका यह बयान दर्शाता है कि आदिवासी अधिकारों का मुद्दा अब और नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। यह सभी राजनीतिक दलों, समाज और सरकार के लिए एक स्पष्ट आह्वान है कि वे इस गंभीर समस्या का समाधान करें।
असम में आगामी चुनाव और केंद्र में बीजेपी की सरकार के रहते, मुख्यमंत्री सोरेन का यह दौरा और उनका मुखर बयान सीधे तौर पर भाजपा को आदिवासी समुदाय के मुद्दों पर जवाबदेही तय करने की चुनौती देता है। चाय बागान क्षेत्रों में आदिवासी मतदाताओं की बड़ी संख्या को देखते हुए, उनके मुद्दे निश्चित रूप से चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। हेमंत सोरेन का यह कदम झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी हितों के चैम्पियन के रूप में अपनी स्थिति को मजबूत करने की रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है। यह संघर्ष केवल चुनावी लाभ से परे, भारत के एक बड़े और महत्वपूर्ण समुदाय के लिए न्याय और समानता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।।
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